अक्सर लोग पूछते है की मै इंग्लिश में क्यों नहीं लिखता , और सुझाव भी देते है कि अगर मै इंग्लिश में लिखूं तो मेरा ब्लॉग ज़्यादा पढ़ा जाएगा। बेशक सभी सही बोलते है , इंग्लिश " लिंग्वा फ्रैंका " है। पिछले कुछ आठ दस सालो पर गौर कीजिये , इंग्लिश और इंग्लिशपन हमारे अंदर तेज़ी से घुसा है। "अंग्रेज़ियत " LPG ( लिब्र्लाइजेशन , प्राइविटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन ) का बाई प्रोडक्ट है , जिस से बचा नहीं जा सकता था। जिन लोगो को अंग्रेजी का ज्ञान भी नहीं होता वो भी अँगरेज़ होते है। टैक्सी वाले ( जिन्हे अब कैब और कैबी कहा जाता है ) , सब्ज़ी की दुकान वाले , पान वाले भैय्या , खेती किसानी करने वाले, ट्रैन के अटेंडेंट्स , हवाई जहाज के सफाई कर्मी , होटल के वेटर्स या कूली, आप चाहे जिसका नाम ले , सब पर्याप्त रूप से अंग्रेजी का इस्तेमाल करते है। ये अंग्रेजी समझते भी है और मोबाइल , ATM , इंटरनेट पे काम चलाऊ अंग्रेजी लिख भी लेते है। मतलब ये की अब अंग्रेजी सिर्फ कान्वेंट एजुकेटेड या ब्लू कालर वाले पढ़े लिखे और संभ्रांत लोगो की लोगो की बपोती नहीं रही , अंग्रेजी का एक्स्पोज़र रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इतना ज्यादा हो गया है कि एक औसत से भी कम बुद्धि का इंसान अगर अपने आँख और कान खोल कर जिए तो सिर्फ दो साल में बेहतरीन कामचलाऊ अंग्रेजी सीख सकता है। सैकड़ों शब्द तो सिर्फ टीवी ने जोड़े दिए है हमारी 'लेक्सिकन ' में। जैसे जैसे टेक्नोलॉजी ज़िन्दगी के अंदर पैंठ बना रही है वैसे वैसे अंग्रेजी भी जड़े जमा रही है। ऐसे समय में अंग्रेजी को समझने लायक ज्ञान होना कोई बड़ी बात नहीं रही। लेकिन सिर्फ व्यवहारिक अंग्रेजी भर आने से कोई डिप्लोमेट या ब्यूरोक्रेट नहीं बन सकता। उसके लिए अन्ग्रेज़ी का मर्मज्ञ होना आवश्यक है , शब्दों के और भाषा के गूढ़ अर्थ की समझ होना आवश्यक है। अंग्रेजी वो भाषा है जो दुनिया के सभी गैर -अंग्रेजी भाषियों लोगो को आपस में जोड़ती है , ये भाषा पूरी दुनिया को एक कलेक्टिव प्लेटफार्म पे लाती है। ऐसे में अंग्रेजी की गहरी समझ नहीं होना एक कमी है। स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट की भाषा में कहे तो " IAS वो प्रोग्राम्स और एप्स है जो देश को चलाते है"। कूटनीतिक फैसले लेना , अंतराष्ट्रीय मंचो पर देश की और से 'सामूहिक सौदेबाज़ी' करना , सामरिक निर्णय लेने जैसे अनेक महत्वपूर्ण कामोँ के लिए उच्च स्तरीय अंग्रेजी का ज्ञान होना ज़रूरी है। इसलिए ऐसे महत्वपूर्ण ओहदों पर नौकरी दिलाने वाली प्रक्रिया में अंग्रेजी की तगड़ी परीक्षा ज़रूरी होना चाहिए। मेरा ब्लॉग बिना अंग्रेजी के भी चल सकता है , लेकिन ये देश अब बिना अंग्रेजी के नहीं चल सकता। नेपाल में हिंदी में काम चल सकता है लेकिन अमेरिका में तो अंग्रेजी बोलना भी पढ़ेगी और धड़धड़ाती अंग्रेजी समझना भी पढ़ेगी। ऐसे में अंग्रेजी के मर्मज्ञ अधिकारियों और नौकरशाहों की ज़रूरत होती है, काम चलाऊ अंग्रेजी जानने वालो की नहीं।
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Wednesday, August 6, 2014
Friday, July 4, 2014
Who is Maria Sharapova ?
विम्बलडन मैच के बाद मारिया शारापोवा से पूछा गया कि क्या उन्हें पता है कि उनका मैच देखने क्रिकेट के एक महान खिलाडी आये थे , तो बहनजी का जवाब था " नहीं " उनसे पूछा गया कि क्या वो सचिन तेंदुलकर को जानती है तो उनका कहना था " नहीं " .
कलेजे में आग लग गयी ये बात जानकार। मारिया शारापोवा की जितनी उम्र नहीं है उससे ज्यादा समय से सचिन क्रिकेट खेल रहे है। और अगर भारत में सचिन के सारे दीवाने एक साथ मिलकर जोर से " आई लव यू सचिन " बोल दे तो मारिया शारापोवा के देश रूस तक आवाज़ पहोच जाए। क्रिकेट के भगवान , भारत रत्न सचिन तेंदुलकर को नहीं जानने से सचिन का रुतबा कम नहीं होता। नुकसान मारिया शारापोवा का ही है , वो जितनी ब्रांड्स एंडोर्स करती है उनकी तो भारत में लुटिया डूबी समझो। सचिन के प्रशंसकों ने कमर कस ली है। ये मारिया शारापोवा की एक भयंकर गलती है। इतनी बड़ी स्पोर्ट्सवुमन होकर दुनिया के इतने बड़े स्पोर्ट्स आइकॉन को नहीं जानती। उस सचिन को जिसका सम्मान डेविड बेकहम , माइकल शूमाकर जैसे महानतम खिलाड़ी भी करते है। पांचवी पास जितना सामान्य ज्ञान नहीं है ?? अगर मै वाल्दीमीर पुतिन होता तो मारिया शारापोवा को रूस से देशनिकाला दे दिया होता। दुनिया में 6 अरब से ज्यादा लोग है , जिनमे से 80 फीसदी से ज्यादा सचिन को नहीं जानते होंगे , जानना ज़रूरी भी नहीं , लेकिन मारिया शारापोवा जैसी खिलाड़ी का अपनी ही फ्रेटर्निटी के इतने बड़े शख्स को नहीं जानना हज़म नहीं होता।
सचिन के फेसबुक पेज को २ करोड़ से ज्यादा लोग लाइक करते है वंही मारिया शारापोवा के पेज को 1. 3 करोड़ ( उसमे से आधे लोग इसलिए करते होंगे क्योकि बहनजी दिखती अच्छी है ) . मारिया शारापोवा को इस 'गुनाह -ए -अज़ीम' के लिए भारत के लोग कभी माफ़ नहीं करेंगे।
Tuesday, July 1, 2014
sbi INTOUCH : Selfie Banking
परिवर्तन शाश्वत है बाकी सब परिवर्तनशील है। अगर ज़िंदा रहना है तो खुद को बदलते रहना होगा। ये बात जितनी इंसानो के लिए सही है उतनी ही कंपनियों और संस्थाओं के लिए भी। जो खुद को बदलते ज़माने के हिसाब से नहीं बदल पाए वो इतिहास हो गए। भारत की सबसे बड़ी और निस्संदेह सबसे भरोसेमंद बैंक " स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया " ने समय रहते "परिवर्तनशील" रहने का ये सबक सीख लिया लगता है। विगत कुछ समय से SBI ने टेक्नोलॉजी का जिस तरह इस्तेमाल करना शुरू किया है उससे तो यही लग रहा है। इंटरनेट बैंकिंग , मोबाइल बैंकिंग , एंड्रॉयड एप्स , इ-कार्नर , केश डिपाजिट मशीन्स , सेल्फ सर्विस कीओस्क ये कुछ ऐसे इनीशिएटिव्स है जो तकनीकी को आधार बनाकर लिए गए है। इसी तारतम्य में आज यानी 1 जुलाई को अपने स्थापना दिवस पर SBI ने एक ऐसा इनिशिएटिव लिया है जो 207 बरस पुरानी इस बैंक को आगामी 200 बरसों तक भारत में बैंकिंग का सिरमौर बनाए रख सकता है। आज से SBI ने डिजिटल बैंकिंग ब्रांच के एक नए युग का सूत्रपात किया है। SBI ने मुंबई , बंगलुरु , चिन्नई , दिल्ली और अहमदाबाद में अपनी 6 डिजिटल ब्रांचेज शुरू की है , डिजिटल ब्रांचेज की इस श्रंखला का नाम रखा गया है " sbi INTOUCH".
जिस देश की आधी आबादी 25 बरस के नीचे की उम्र की हो और जहाँ हर नौजवान 'टच' स्क्रीन का स्मार्ट मोबाइल फ़ोन रखता हो वंहा युवा ग्राहकों से सतत 'टच' में रहने हेतु टेक्नोलॉजी ही इकलौता विकल्प है। SBI के डिप्टी MD श्री S K मिश्रा कहते है " InTouch" SBI की डिजिटल यात्रा का शुभारम्भ है"।ये प्रयास है जेन "Y" को Brand SBI के टच में रखने का।
" sbi INTOUCH" पर इंस्टेंट अकाउंट ओपनिंग , इंस्टेंट पर्सनलाइज्ड डेबिट कार्ड , लोन्स के 'इन-प्रिंसिपल' अप्रूवल जैसी अनेको सुविधाए उपलब्ध रहेगी। कुल जमा , ये बैंकिंग का वो मज़ा है जिसका अनुभव पहले कभी नहीं किया गया। " sbi INTOUCH" में तकनीकी सहयोगी " एक्सेंचर " है जो एक नामी IT कंपनी है। आज माननीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने दिल्ली में पहली " sbi INTOUCH"" शाखा का उद्घाटन किया। श्री जेटली ने इसके तुरंत बाद ट्वीट कर बताया की " sbi INTOUCH" तकनीक के सहारे उठाया गया एक सशक्त कदम है जो आज के महत्वकांशी युवाओ को केंद्र में रख के उठाया गया है।
" sbi INTOUCH" के बारे में ज्यादा जानने के लिए आप इस लिंक को एक्सप्लोर कर सकते है http://www.sbi.co.in/intouch/
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Tuesday, June 10, 2014
'नक्सलवादी आँखे
अभी हाल ही में कुछ काम से छत्तीसगढ़ गया था । पहले भी अनेको बार जाता रहा हूँ लेकिन इस बार की अनुभूति कुछ अलग रही। जिस दिन जगदलपुर पंहुचा उस दिन आई-ट्यून्स से एक फिल्म के गाने डाउनलोड किये एक गाने के बोल कुछ यूं थे - छप्पन छुरी छत्तीसगढ़ी अखियाँ तेरी नक्सलवादी। बड़ा अजीब लगा ये बोल सुनकर। 'नक्सलवादी आँखे' निस्संदेह एक नया जुमला है लेकिन इस किस्म के जुमले एग्रीगेटेड फैक्ट्स को सच्चाई मानकर चलने वाले अनेक लोगो के पूर्वाग्रह को और पुख्ता कर देते है। जगदलपुर का नाम सुनकर एक आम इंसान के दिमाग में बड़ी भयवाह सी तस्वीर बनती है। घने जंगल , आदिवासी लोग सी. आर. पी. एफ. की गश्ती टुकड़ियां और बारूदी सुरंगे। लाज़मी सी बात है क्योकि अखबारों और अन्य मीडिया में यही सब दिखाया जाता है इसीलिए हर दफे जब छत्तीसगढ़ जाता हूँ तो सब हिदायत देते है कि ज़रा सम्हाल के जाना। इस बार मैंने भी आँखों की कुछ जोड़ियों को देखा , जो नक्सलवादी नहीं आशावादी थी। इसके अलावा कुछ और फोटोग्राफ्स भी खीच के लाया ताकि यहाँ आके बता सकूँ की जगदलपुर अफ़ग़ानिस्तान नहीं है और न वंहा कदम कदम पे मुह पे कपडा बांधे तालिबानी लड़ाके घूमते है।
Monday, June 9, 2014
Lekar Hum Deewana Dil ( 2014) : Music Review
ऐसा बोलते है कि आगाज़ अच्छा तो आधा काम ख़त्म। 'लेकर हम दीवाना दिल ( LHDD ) के डायरेक्टर आरिफ अली ने जब रहमान को इस फिल्म का म्यूजिक कंपोज़ करने के लिए राज़ी किया होगा तो उनके दिमाग में भी यही बात रही होगी। जब एक नया डायरेक्टर अपनी पहली ही फिल्म में दो एकदम नए चेहरों के साथ एक रोमकॉम बनाता है तो ए आर रहमान से ज्यादा सेफ बेट ( सुरक्षित दाव ) कुछ नहीं हो सकता। LHDD में रहमान एक नए अवतार में है , जो विशुद्ध रूप से युवाओं के लिए है। ऐसे युवाओ के लिए जो संगीत को समझकर सुनने की बजाय सुनते ही थिरकना चाहते है। जिन्हे क्लिष्ट राग-रागनियों और उम्दा सूफी शायरी की दरकार नहीं है , जिन्हे चाहिए ऐसा संगीत जो सुनते ही रगो में 'एड्रेनैलिन रश' को बढ़ा दे। ऐसा म्यूजिक जिसकी लिरिक्स 'वाट्सएपनुमा ' हो और जिसे बिना दिमाग लगाये On the go सुना जा सके। रहमान ने ठीक वैसा ही संगीता रचा है , और उन्हें कॉम्पलिमेंट किया है आज के दौर के सबसे बिकाऊ लिरिसिस्ट अमिताभ भट्टाचार्य ने। अमिताभ वो भाषा लिखते है जो आज का युवा बोलता है , इसके अलावा अमिताभ हिंदी सिनेमा में अपनी एक अलग लेक्सिकन लेकर आये है जो सबसे 'अलेहदा ' है।
LHDD रहमान का एक ऐसा दुर्लभ एल्बम है जिसके लगभग सारे गाने पहली बार सुनने में ही जुबान पर चढ़ जाते है , ऐसा इसलिए है क्योकि सारे गानो को निहायत ही सरल मौसिकी पर बनाया गया है। रहमान ने ' अकूस्टिक' गिटार और ड्रम्स भरपूर उपयोग किया है जिससे कॉलेज के लोकल रॉकस्टार्स इन्हे आसानी से आत्मसाध कर सके और उन्हें इन गानो से कंनेक्ट करने में आसानी हो। याद कीजिये ' ३ इडियट्स ' का ' सारी उम्र हम मर - मर के जी लिए ' ये गाना कॉलेज और होस्टल्स का ' एन्थम ' इसलिए बन गया था क्योकि वो गाने में और ' अकूस्टिक' गिटार पर बजाने में आसान था।
खलीफा - ये इस एल्बम की सबसे पहली रिलीस्ड ट्रैक थी। खलीफा पुरे एल्बम का मूड सेट करती है। बकौल रहमान ' खलीफा ' LHDD के लिए बनायीं गयी सबसे पहली ट्रैक थी जिसे अमिताभ भट्टाचार्य के साथ एक रात के जैमिंग सेशन में कंपोज़ किया गया था। गाने की शुरुवात ' श्वेता पंडित और सुज़ेन डिमेलो की ' रैप ' लिरिक्स से होती है। खलीफा इलेक्ट्रॉनिक बेस पर कंपोज्ड डीजेनुमा ट्रैक है। ऐसा लगता है जैसे अनेक इंस्ट्रूमेंट्स और आवाज़ों को परत-दर -परत चढ़ाकर ये ट्रैक बनी है और इन सब लेयर्स को जो दमदार ग्लू आपस में जोड़ता है वो है रहमान की पंचम सप्तक वाली ग़मकदार आवाज़। ये गाना इस बात का सबसे सशक्त उदाहरण है कि रहमान वाकई तकनीकी कौशल के ' खलीफा' है।
मालूम - मालूम कनाडा की कंठ-कोकिला जोनिता गांधी और ह्रदय गट्टानी द्वारा गाया एक बेहद मधुर गाना है जो गिटार के एक खूबसूरत पीस से शुरू होता है। इस गाने में रहमान के रेगुलर गिटारिस्ट ' केबा ' ने ज़बरदस्त बेस दिया है। गाना बेसिकली एक लेड बेक और कूल लड़के और एक शोख और ज़िंदादिल लड़की का ' विज़न स्टेटमेंट ' है। इस गाने के लिए ह्रदय और जोनिता रहमान की स्वाभाविक पसंद रहे होंगे। ह्रदय गट्टानी रहमान के KM कॉलेज के छात्र है और इसके पहले रहमान द्वारा कंपोज्ड ए पी जे अब्दुलकलाम की कविता ' वन विज़न ' को अपनी आवाज़ दे चुके है। उनकी आवाज़ में लड़कपन और बेफिक्री है वंही जोनिता की आवाज़ में शोखी , ज़िंदादिली और आत्मविश्वास है , यही इस गाने का बेसिक आर्किटेक्ट है। गाने का पहला हाफ ह्रदय गाते है और फिर सेकंड हाफ में जोनिता एक नोट ऊपर से गाते हुए इससे क्रेसेंडो तक लेकर जाती है। असल में इस गाने की ' रौनक ' जोनिता ही है जो एल्बम - दर -एल्बम और कॉन्सर्ट -दर -कॉन्सर्ट निखरती जा रही है। जोनिता ने अरिजीत सिंह के साथ ' कोच्चिड़यन ' का बेहद मधुर और कठिन गाना ' दिलचस्पियां ' भी गाया है , जो असल में रहमान के लिए उनका गाया सबसे पहला गाना था।
अलाहदा : अलाहदा असल में ' उर्दू के 'अलेहदा' लफ्ज़ का परिवर्तिति स्वरुप है। अलेहदा का मतलब होता है जुदा , अलग। ये एक विरह गीत है। इस गाने के गायक शिराज़ उप्पल है जो पाकिस्तान के बेहद मक़बूल फनकार है और 2013 में आई फिल्म ' रांझणा ' का टाइटल ट्रैक गा चुके है । शिराज़ ने एक कॉलेज के युवा की बेबसी और विरह से पैदा हुई चीख को निहायत ही साफगोई और शिद्दत से इस गाने में उतार दिया है। पूरा गाना अकूस्टिक गिटार पर एक जैसी गति से चलता है। शिराज़ की आवाज़ सुनकर लगता है की वो एक 20 बरस के लड़के है जबकि असल में वो 13 बरस के एक पुत्र के पिता है। शिराज़ न सिर्फ एक अच्छे फनकार है बल्कि एक निर्मल ह्रदय के इंसान और एक ज़िम्मेदार और तरक्कीपसंद पाकिस्तानी नागरिक भी है। ये पाकिस्तान के प्रिंट और विसुअल मीडिया में नियमित आते है और समसामयिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय भी देते है। रहमान को अपना गुरु मानने वाले शिराज़ लाहौर में एक स्टेट ऑफ़ आर्ट रिकॉर्डिंग स्टूडियो के मालिक है। हालही में इन्होने नीति मोह साथ ' रेज़ा -रेज़ा ' नामका एक गाना कंपोज़ किया है और गाया भी है जो एक बेहतरीन ट्रैक बन पढ़ी है।
मवाली कव्वाली : मवाली कव्वाली को कनाडा से आने वाले एक और सिंगर राघव माथुर और रहमान के लिए गाने वाली एक अत्यंत प्रतिभावान गायिका तन्वी शाह ने गाया है। गाने की शुरुवात तन्वी शाह की लिखी और गायी स्पेनिश लिरिक्स से होती है उसके बाद राघव गाने को आगे ले जाते है । ये एक टिपिकल टेंप्लेटाइज़्ड ए आर रहमान कम्पोजीशन है। इस किस्म के दर्ज़नो गाने रहमान समोसे और कचौड़ियों की तरह तल सकते है। रहमान के ऐसे गाने रिलीज़ होने के साथ ही हिट हो जाते है। इस गाने को सुनते ही " रावण " फिल्म के 'बीरा' की याद आती है। मवाली कव्वाली का USP है अमिताभ भट्टाचार्य की प्रयोगधर्मी लिरिक्स। ज़रा इस पर गौर कीजिये - छप्पन छुरी छत्तीसगढ़ी अखियाँ तेरी नक्सलवादी , या फिर मवाली , बवाली , रुमाली जैसी तुगबंदियाँ। ये एक नयी भाषा है , एक नया प्रयोग है जो फेसबुक जनरेशन को टारगेट करता है जो अभी भी ' चार बोतल वोडका ' में झूम रही है। बाकी गानो से अलग मवाली कव्वाली में कोर्डिंग के लिए गिटार के साथ साथ पियानो का भी इस्तेमाल हुआ है जो ओवरआल लिसनिंग एक्सपीरियंस को एलिवेट कर देता है। मेरा अनुमान है ये पियानो रहमान ने खुद बजाया है।
बेक़सूर - ये गाना आपके दिमाग और दिल में चढ़ने में सबसे ज्यादा टाइम लगाएगा। लेकिन ये गाना मौसिकी , शायरी और गायकी के लिहाज़ से इस एल्बम का सबसे बेहतरीन गाना है। मेरे ख्याल से रहमान ने इस ट्रैक को कंपोज़ करने में सबसे ज़्यादा वक़्त लगाया होगा और इसकी 'शेल्फ लाइफ' बाकी गानो से काफी ज्यादा रहने वाली है । इस ट्रैक के हर हिस्से पे रहमान की छाप है। इस गाने से ये भी समझ आता है की अमिताभ भट्टाचार्य सिर्फ हिंगलिश तुगबंदियों के ही उस्ताद नहीं है बल्कि एक उम्दा गीतकार भी है। गाने के बोल रूहानी है और उतनी ही रुहदार है श्वेता पंडित और नकाश अज़ीज़ के आवाज़ें। श्वेता निस्संदेह क्लासिकल गाने वाली आज के समय की सबसे उम्दा गायिका है। उनकी आवाज़ में तालीम और रियाज़ का असर साफ़ सुनाई देता है। नकाश जब हाई पिच पे गाते है तो ' शान ' जैसे सुनाई पढ़ते है , उनकी गायकी पर 'शान' और 'केके' का प्रभाव झलकता है। ये रात का नग़मा है , जब आधी रात को कार के हॉर्न्स का शोर थम जाए तब अपनी बालकनी में खड़े होकर इस गाने को आई -पैड पर सुनियेगा , रात की सारी स्याही आपकी रगो में उतर आएगी। ये रहमान का जादू है , रहमानइश्क।
तू शाइनिंग - ये ड्यूरेशन के लिहाज़ से एल्बम की सबसे छोटी ट्रैक है। तू शाइनिंग ' सेमेस्टर ब्रेक ' की मस्ती और पहले प्यार की रुमानियत से सराबोर ' बॉयज़ोन ' स्टाइल का गाना है। गाने में ड्रम्स , विशेषकर सिंबल्स , का ज़बरदस्त यूज़ किया गया है। ह्रदय गट्टानी मुंबई के अनप्लग्ड सर्किट में उभरता हुआ नाम है और " बॉम्बे " के ' हार्ड रॉक कैफ़े ' में इसी किस्म का फ्यूज़न गाते है इसलिए इस गाने के लिए वो सबसे ज्यादा फिट रहे होंगे। बेस गिटार के इस्तेमाल से गाने में ' मच डिज़ाइर्ड ' वज़न आ गया है। इस गाने से ह्रदय के लिए भविष्य में बहोत से दरवाज़े खुलने वाले है क्योकि ये आजकल का सबसे कॉमनली यूस्ड जोनऱ है।

LHDD में रहमान का संगीत 2003 में आई उनकी तमिल सुपरहिट " बॉयज " की याद दिलाता है। " बॉयज " में रहमान ने अदनान सामी , शिराज़ उप्पल , लकी अली , कार्तिक और वसुंधरा दास जैसी उस वक़्त के उभरते गायको को साथ लेकर टैंग्लिश ( तमिल और इंग्लिश ) लिरिक्स को ऐसे संगीत में पिरोया था जिसे तमिलनाडु के सारे FM रेडियो स्टेशन्स आज भी बजाते है। LHDD के म्यूजिक से रहमान ने ये बताया है की उनमे चिन्नई का वो ' लड़का ' आज भी वैसा ही ज़िंदादिल और अल्हड़ है।
सालों से सेहतमंद और होलसम संगीत के आदी रहमान भक्तो के लिए ' मास्टर शेफ चिन्नई ' ने इस बार ' फ़ास्ट फ़ूड ' परोसा है। लेकिन ये ' फ़ास्ट फ़ूड ' स्पेनिश ओलिव आइल , कैनेडियन लेट्यूस और पस्किस्तानी हलीम गोश्त से लबरेज़ है इसलिए जी भर के खाइए।
MY VERDICT - " छे के छे हीरे है " .
4.75/5.00
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