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Monday, June 9, 2014

Lekar Hum Deewana Dil ( 2014) : Music Review


 ऐसा बोलते है कि आगाज़ अच्छा तो आधा काम ख़त्म।  'लेकर हम दीवाना दिल ( LHDD ) के डायरेक्टर आरिफ अली ने जब रहमान को इस फिल्म का म्यूजिक कंपोज़ करने के लिए राज़ी किया  होगा तो उनके दिमाग में भी यही बात रही  होगी। जब एक नया डायरेक्टर अपनी पहली ही फिल्म में दो एकदम नए चेहरों के साथ एक रोमकॉम बनाता है  तो  ए  आर रहमान से ज्यादा सेफ बेट ( सुरक्षित दाव ) कुछ नहीं हो सकता। LHDD में रहमान एक नए अवतार में है , जो विशुद्ध रूप से युवाओं के लिए है। ऐसे युवाओ के लिए जो संगीत को समझकर सुनने की बजाय सुनते ही थिरकना चाहते है।  जिन्हे क्लिष्ट राग-रागनियों और उम्दा सूफी शायरी की दरकार नहीं है , जिन्हे चाहिए ऐसा संगीत जो सुनते ही रगो में 'एड्रेनैलिन रश' को बढ़ा दे। ऐसा म्यूजिक जिसकी लिरिक्स 'वाट्सएपनुमा ' हो और जिसे  बिना दिमाग लगाये On the go सुना जा सके।   रहमान ने ठीक वैसा ही संगीता रचा है , और उन्हें कॉम्पलिमेंट किया है आज के दौर के सबसे बिकाऊ लिरिसिस्ट  अमिताभ भट्टाचार्य ने।  अमिताभ वो भाषा लिखते है जो आज का युवा बोलता है , इसके अलावा अमिताभ हिंदी सिनेमा में अपनी एक अलग लेक्सिकन लेकर आये है जो सबसे 'अलेहदा  ' है। 

 LHDD  रहमान का  एक ऐसा दुर्लभ एल्बम है जिसके लगभग सारे गाने पहली बार सुनने में ही जुबान पर चढ़ जाते है , ऐसा इसलिए है क्योकि सारे गानो को निहायत ही सरल मौसिकी   पर बनाया गया है।  रहमान ने   ' अकूस्टिक' गिटार और ड्रम्स भरपूर उपयोग किया है जिससे  कॉलेज के लोकल रॉकस्टार्स इन्हे  आसानी से आत्मसाध कर सके और उन्हें इन गानो से कंनेक्ट करने में आसानी हो।  याद कीजिये ' ३ इडियट्स ' का  ' सारी उम्र हम मर - मर के जी लिए ' ये गाना कॉलेज और होस्टल्स का ' एन्थम ' इसलिए बन गया था क्योकि  वो  गाने में  और ' अकूस्टिक' गिटार पर बजाने  में आसान था।  

 खलीफा - ये इस एल्बम की सबसे पहली रिलीस्ड ट्रैक थी।  खलीफा पुरे एल्बम का मूड सेट करती है।  बकौल रहमान ' खलीफा ' LHDD के लिए बनायीं गयी सबसे पहली ट्रैक थी जिसे अमिताभ भट्टाचार्य के साथ एक रात के जैमिंग सेशन में कंपोज़ किया गया था। गाने की शुरुवात ' श्वेता पंडित और सुज़ेन डिमेलो की ' रैप ' लिरिक्स से  होती है।  खलीफा इलेक्ट्रॉनिक बेस पर कंपोज्ड डीजेनुमा ट्रैक है।  ऐसा लगता है जैसे अनेक इंस्ट्रूमेंट्स और आवाज़ों को परत-दर -परत चढ़ाकर ये ट्रैक बनी है और इन सब लेयर्स को जो दमदार ग्लू आपस में जोड़ता है वो है रहमान की पंचम सप्तक वाली ग़मकदार आवाज़। ये गाना इस बात का सबसे सशक्त  उदाहरण है कि रहमान वाकई  तकनीकी कौशल के ' खलीफा' है।  

मालूम - मालूम कनाडा की कंठ-कोकिला  जोनिता गांधी और ह्रदय गट्टानी द्वारा गाया एक बेहद मधुर गाना  है जो  गिटार के एक खूबसूरत पीस से शुरू  होता है।  इस गाने में रहमान के रेगुलर गिटारिस्ट ' केबा ' ने ज़बरदस्त बेस दिया है।  गाना बेसिकली एक लेड बेक और कूल लड़के और एक शोख और ज़िंदादिल लड़की का ' विज़न स्टेटमेंट ' है।  इस गाने के लिए ह्रदय और जोनिता रहमान की स्वाभाविक पसंद रहे होंगे।  ह्रदय गट्टानी  रहमान के KM कॉलेज के छात्र है और इसके पहले रहमान द्वारा कंपोज्ड ए पी जे अब्दुलकलाम की कविता ' वन विज़न ' को अपनी आवाज़ दे चुके है।  उनकी आवाज़ में लड़कपन और  बेफिक्री है वंही जोनिता की आवाज़ में शोखी , ज़िंदादिली और आत्मविश्वास है , यही इस गाने का बेसिक आर्किटेक्ट है।  गाने का पहला हाफ ह्रदय गाते है और फिर सेकंड हाफ में जोनिता एक नोट ऊपर से गाते हुए इससे क्रेसेंडो तक लेकर  जाती है।  असल में इस गाने की ' रौनक ' जोनिता ही है जो एल्बम - दर -एल्बम और कॉन्सर्ट -दर -कॉन्सर्ट निखरती जा रही है।  जोनिता ने अरिजीत सिंह के साथ  ' कोच्चिड़यन ' का बेहद मधुर और कठिन गाना ' दिलचस्पियां '  भी गाया है , जो असल में रहमान के लिए उनका गाया सबसे पहला गाना था।  

अलाहदा  :  अलाहदा असल में ' उर्दू के 'अलेहदा' लफ्ज़  का  परिवर्तिति स्वरुप है।   अलेहदा का मतलब होता है जुदा , अलग।  ये एक विरह गीत है।  इस गाने के गायक शिराज़ उप्पल है जो पाकिस्तान के बेहद मक़बूल फनकार है और 2013 में आई फिल्म ' रांझणा ' का टाइटल ट्रैक गा चुके है ।  शिराज़ ने  एक कॉलेज के युवा की बेबसी और विरह से पैदा हुई चीख को निहायत ही साफगोई और शिद्दत से इस गाने में उतार दिया है।  पूरा   गाना अकूस्टिक गिटार पर एक जैसी गति से चलता है।  शिराज़ की आवाज़ सुनकर लगता है की वो एक 20 बरस के लड़के है जबकि असल में वो  13 बरस के  एक पुत्र के पिता है।  शिराज़ न सिर्फ एक अच्छे फनकार है बल्कि एक निर्मल ह्रदय के इंसान और एक ज़िम्मेदार और तरक्कीपसंद पाकिस्तानी नागरिक भी है।  ये पाकिस्तान के प्रिंट और विसुअल मीडिया में नियमित आते है और समसामयिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय भी देते है।  रहमान को अपना गुरु मानने वाले शिराज़ लाहौर में एक स्टेट ऑफ़ आर्ट रिकॉर्डिंग स्टूडियो के मालिक है। हालही में   इन्होने नीति मोह  साथ ' रेज़ा -रेज़ा ' नामका एक गाना कंपोज़ किया  है और गाया भी है  जो एक बेहतरीन ट्रैक बन पढ़ी है।  

मवाली कव्वाली : मवाली कव्वाली को कनाडा से आने वाले एक और सिंगर राघव माथुर और रहमान के लिए गाने वाली एक अत्यंत प्रतिभावान गायिका   तन्वी शाह ने  गाया है। गाने की शुरुवात तन्वी शाह की लिखी और गायी  स्पेनिश लिरिक्स से होती है उसके बाद राघव गाने को आगे ले जाते है  ।  ये एक टिपिकल टेंप्लेटाइज़्ड ए आर रहमान कम्पोजीशन है।  इस किस्म के दर्ज़नो  गाने रहमान समोसे और कचौड़ियों की तरह तल सकते है। रहमान के ऐसे गाने रिलीज़ होने के साथ ही हिट हो जाते है।  इस गाने को सुनते ही " रावण " फिल्म के 'बीरा' की याद आती है।  मवाली कव्वाली का USP है अमिताभ भट्टाचार्य की प्रयोगधर्मी लिरिक्स।  ज़रा इस पर गौर कीजिये - छप्पन छुरी छत्तीसगढ़ी अखियाँ तेरी नक्सलवादी , या फिर मवाली , बवाली , रुमाली जैसी तुगबंदियाँ।   ये एक नयी भाषा है , एक नया प्रयोग है जो फेसबुक जनरेशन को टारगेट करता है जो  अभी भी ' चार बोतल वोडका ' में झूम रही है।  बाकी गानो से अलग मवाली कव्वाली में कोर्डिंग के लिए गिटार के साथ साथ  पियानो का भी  इस्तेमाल हुआ है जो ओवरआल लिसनिंग  एक्सपीरियंस को  एलिवेट कर देता है।  मेरा अनुमान है ये पियानो रहमान ने खुद बजाया  है।  

बेक़सूर - ये गाना  आपके दिमाग और दिल में चढ़ने में सबसे ज्यादा टाइम लगाएगा।  लेकिन   ये गाना मौसिकी , शायरी और गायकी के लिहाज़ से इस एल्बम का सबसे बेहतरीन गाना है।  मेरे ख्याल से रहमान ने इस ट्रैक को कंपोज़ करने में सबसे ज़्यादा वक़्त लगाया होगा  और इसकी 'शेल्फ लाइफ' बाकी गानो से काफी ज्यादा रहने वाली है  । इस ट्रैक के हर हिस्से पे रहमान की छाप है।  इस गाने से ये भी  समझ आता है की अमिताभ भट्टाचार्य सिर्फ हिंगलिश तुगबंदियों  के ही  उस्ताद नहीं है बल्कि एक उम्दा गीतकार भी है। गाने के बोल रूहानी है और उतनी ही रुहदार है श्वेता पंडित और नकाश अज़ीज़ के आवाज़ें।  श्वेता निस्संदेह क्लासिकल गाने वाली आज के समय की सबसे उम्दा गायिका है।  उनकी आवाज़ में तालीम और रियाज़ का असर साफ़ सुनाई देता  है।  नकाश जब हाई पिच पे गाते है तो ' शान '  जैसे सुनाई पढ़ते है , उनकी गायकी पर 'शान' और 'केके' का प्रभाव झलकता है।  ये रात का  नग़मा है , जब आधी रात को कार के हॉर्न्स का शोर थम जाए तब अपनी  बालकनी  में खड़े होकर इस गाने को आई -पैड  पर सुनियेगा , रात की सारी स्याही आपकी रगो में उतर आएगी।  ये रहमान का जादू है , रहमानइश्क।  

तू शाइनिंग -  ये ड्यूरेशन के लिहाज़ से एल्बम की सबसे  छोटी  ट्रैक है।  तू शाइनिंग ' सेमेस्टर ब्रेक ' की मस्ती  और पहले प्यार की रुमानियत से सराबोर ' बॉयज़ोन ' स्टाइल  का गाना है।  गाने में ड्रम्स , विशेषकर सिंबल्स , का ज़बरदस्त यूज़ किया गया है। ह्रदय गट्टानी मुंबई के  अनप्लग्ड सर्किट में उभरता हुआ नाम है और " बॉम्बे " के ' हार्ड रॉक कैफ़े ' में इसी किस्म का फ्यूज़न गाते है इसलिए इस गाने के लिए वो सबसे ज्यादा फिट रहे होंगे।  बेस गिटार के  इस्तेमाल से गाने में ' मच डिज़ाइर्ड ' वज़न आ गया है।  इस गाने से ह्रदय के लिए भविष्य में बहोत से दरवाज़े खुलने वाले है क्योकि ये आजकल का सबसे कॉमनली यूस्ड जोनऱ है।  


LHDD  में रहमान का संगीत 2003 में आई उनकी तमिल सुपरहिट " बॉयज " की याद दिलाता है।  " बॉयज " में रहमान ने  अदनान सामी , शिराज़ उप्पल , लकी अली , कार्तिक और वसुंधरा दास जैसी उस वक़्त के उभरते गायको  को  साथ लेकर  टैंग्लिश (  तमिल और इंग्लिश ) लिरिक्स को ऐसे संगीत में पिरोया था जिसे तमिलनाडु के सारे FM रेडियो स्टेशन्स आज भी बजाते है।  LHDD के म्यूजिक से रहमान ने ये बताया है की उनमे चिन्नई का वो ' लड़का '  आज भी वैसा ही ज़िंदादिल और अल्हड़ है।  

सालों से  सेहतमंद और होलसम संगीत के आदी रहमान भक्तो के लिए ' मास्टर शेफ चिन्नई ' ने इस बार '  फ़ास्ट फ़ूड ' परोसा है।  लेकिन ये '  फ़ास्ट फ़ूड ' स्पेनिश ओलिव आइल , कैनेडियन लेट्यूस और पस्किस्तानी हलीम गोश्त से लबरेज़ है इसलिए जी भर के खाइए।  


MY VERDICT -  " छे के छे हीरे है " .
4.75/5.00






Thursday, May 8, 2014

लेकर हम हम दीवाना दिल : Lekar Hum Deewana Dil

"लेकर हम हम दीवाना दिल" , राज कपूर की सुपुत्री रीमा कपुर ( जैन ) के सुपुत्र अरमान जैन औऱ फेमिना मिस इंडिया 2009  की फाइनलिस्ट दीक्षा सेठ ( आाजकल तेलगु फिल्मो की दीपिका पादुकोण ) की  फिल्म है।  फिल्म में जो  तीन सबसे खास बाते है  पेहली क़ि  ये सैफ आली ख़ान के द्वारा प्रोड्यूस्ड पहली फिल्म है , दूसरा क़ि  ये आरिफ अली द्वारा निर्देशित पहली फिल्म है , आरिफ अली इम्तिआज़ अली के भाई है और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि इसमे ए  आऱ रहमान का म्यूजिक है।
सौजन्य : इरोज़ 
ऐसा बोला जा रहा है कि रहमान ने इस फ़िल्म में एक अलग किस्म की साउंड इज़ाद की है और ऐसा संगीत दिया हैं जो पहले कभी नहीं सुना गया।  यानी रहमान के दीवानो क़ी भरी गर्मीं मे दिवाली ओर होली  होनें वाली है।  रहमान की पिछली तीन फिल्में " जब  तक है जान " " रांझणा " और " हाईवे " संगीत की दृष्टि से उच्च कोटि की थी परन्तु फिर भी आम जनता के मन  में " रॉकस्टार " जैसा सैलाब पैदा नहीं कऱ पायी।  

"लेकर हम हम दीवाना दिल" से उम्मीद की  जा  रही है कि ये रहमान  की " रंग दे बसंती " और " जाने तू या जाने ना " वाली विरासत को  आगे बढ़ाएगी।  फिल्म 4 जुलाई को रिलीज़ होगी यानि म्यूजिक 15 मई के बाद रिलीज़ हो सकता हैं।  गानो के बोल अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे है जो एक उभरते हुए गीतकार और गायक  है ( २ स्टेट्स का " ओफ्फो " इन्होने ही लिखा और  गाया है ) 

"लेकर हम हम दीवाना दिल" के म्यूजिक रिव्यु के लिऐ #BLAH BLAH BLOG से जुड़े रहे।  

Friday, February 28, 2014

रौनक़

"रौनक " - कपिल सिब्बल की कविताओ का संकलन , जिसे ए  आर रहमान ने संगीतबद्ध किया है।  "किस्मत से"  इसका पहला ट्रैक है।  

Saturday, February 1, 2014

HIGHWAY (2014): MUSIC REVIEW




ऐसा लगभग हर बार होता है , ए  आर रहमान की कंपोज्ड फ़िल्म का म्यूजिक रिलीज़ होता है ,  हम पहली दफे  गाने सुनते है और सोचते है ' यार इस बार रहमान चूक गये  ,  क्या तो भी गाने बनाये है ' ' रहमान में अब वो रोज़ा रंगीला वाली बात नहीं रही'।  रहमान के पक्के से पक्के दीवाने भी इस फिनोमिना से नहीं बच पाते। ये हर बार सबके साथ होता है , चाहे "ताल" हो "गुरु" हो " जाने तू या जाने ना " हो या फिर " रॉकस्टार " हो।   रहमान का म्यूजिक पहली बार बेतुका और अजीब ही  लगता है।  लेकिन जैसे जैसे हम सुनते जाते है वैसे वैसे रहमान की  कम्पोज़िशंस का जादू चढ़ता जाता है।  और फिर वो कम्पोज़िशंस  हमारी परमानेंट ट्रैक लिस्ट में शामिल हो जाती  है।  रहमान प्रिडेक्टिबल नहीं है , इसीलिए उनका हर नया एल्बम उनके संगीत के नए आयामों को खोलता है।  रहमान खुद इस बात को स्वीकार करते है कि कंपोजर के तौर पर वो हर ३ साल में खुद को नया और अलग पाते है।

21 फेब्रुअरी को रिलीज़ होने वाली  हाईवे इम्तिआज़ अली के द्वारा निर्देशित फ़िल्म है जिसमे ए  आर रहमान ने म्यूजिक दिया है और इरशाद कामिल ने गानो के बोल लिखे है।  इसके पहले रहमान इम्तिआज़ और इरशाद  की त्रिमूर्ति २०११ में रॉकस्टार में साथ आयी थी जिसके सारे गाने सूपर हिट थे।  ज़ाहिर  सी बात है कि हाईवे के संगीत को लेकर लोगो कि उम्मीदें बहुत ऊँची थी और रहमान इम्तिआज़ और इरशाद की ये तिकड़ी  अपने मुरीदों की उम्मीदों पर सौ फीसदी खरी उतरी है ।  हाईवे का म्यूजिक 24 जेनुअरी को रिलीज़ हो गया था लेकिन उसका रिव्यु लिखने के पहले ये ज़रूरी था कि फ़िल्म की कहानी के बैकड्रॉप में रहमान कि कम्पोज़िशंस का बेसिक आर्किटेक्ट समझ लिया जाए।

इम्तिआज़ अली नई पीढ़ी के फ़िल्मकार है , 'लव आजकल' 'जब वी मेट' और  ' रॉकस्टार'  देखकर ये बात समझ आजाती है कि उन्हें आज पीढ़ी के टेस्ट और रुझान कि ज़बरदस्त समझ है साथ ही उन्हें  अपने कंपोजर से सर्वश्रेस्ठ म्यूजिक निकलवाने में भी महारथ हांसिल है।  हाईवे को लेकर इम्तिआज़ शुरू से क्लियर थे कि रहमान इसके लिए अपरिहार्य है।  इम्तिआज़ अली को भी ये पता है कि अगर कोई संगीतकार जेन -X के लिए सबसे मुफीद है तो वो रहमान ही है।  हाईवे के संगीत की एक और खास बात है कि इसमें सिर्फ एक गाना सुनीधि चौहान जैसी स्थापित और पुरानी गायिका ने गाया है , बाकी सारे गाने यंग लड़कियों ने गाये है।  " नूरां सिस्टर्स" " ज़ेब " "जोनिता गांधी" "स्वेता पंडित " " सुवी  सुरेश "  " लेडी काश और क्रिसी " ये सब लड़कियां 'यू ट्यूब' और कोक स्टूडियो जनरेशन की कलाकार है। ये सब सिंगर्स आज की जनरेशन को रिप्रेजेंट करती है।  पुरे एल्बम में सिर्फ 2 गाने मेल वॉइस में है और दोनों रहमान ने खुद गाये है ,  बाकि सारे गाने फीमेल वॉइस में है साफ़ है कि फ़िल्म आलिया भट्ट के किरदार के आसपास घूमती है।  एल्बम में कुल 9 साउंड ट्रैक्स है जिसमे से एक " पटाखा गुड्डी " मेल और फीमेल वर्शन में है जबकि " इम्प्लोसिव साइलेंस " में सिर्फ आलाप है।

माही वे - माही वे गाना इस एल्बम कि सबसे सरल कम्पोजीशन है इसलिए ये गाना पहली बार सुनकर ही  अच्छा लगने लगता है। इस गाने में रहमान ने इंट्रूमेंट्स का उपयोग भी बहोत कम किया है।  इरशाद कामिल ने इस गाने को मुखड़ा -अंतरा की गीत शैली में न लिखकर नज़्म शैली में लिखा है।  रहमान की रूहानी और हाई पिच वाली गायकी इस गाने को सूफियाना टच देती है। इस गाने के शुरू में गिटार फैमिली के एक इंस्ट्रूमेंट उकुलेले का उम्दा यूज़ किया गया है।  रिलीज़ होने के एक दिन के भीतर ही ये गाना I-TUNES में नंबर दो पर आ गया था।

कहाँ हूँ  मै - ये गाना कनाडा बेस्ड आर्टिस्ट जोनिता गांधी ने गाया है जो इसके पहले चेन्नई एक्सप्रेस का टाइटल सांग भी गा  चुकी है।  जोनिता गांधी, यू ट्यूब पे मशहूर पियानिस्ट  आकाश गांधी के साथ बॉलीवुड गानो के कवर वर्शन गाती है और इनके विडिओज़  लाखों लोगों द्वारा देखे जाते है। आजकल जोनिता सोनू निगम की कॉन्सर्ट ट्रूप का हिस्सा है.   जोनिता कि आवाज़ सुनकर लगता है कि जैसे वो एक ओपेरा सिंगर है जिसे  भारतीय शास्त्रीय संगीत की भी गेहरी समझ है।  कहाँ हूँ मै गाना जोनिता कि सधी हुई और ताज़ा आवाज़ के कारण आपको एक अलग दुनिया में ले जाता है।  एक ऐसी दुनिया जहाँ पहुच  के मन में यही ख्याल आता है कि " कहाँ हूँ मै ".

पटाखा गुड्डी( फीमेल वर्शन )  - "पटाखा गुड्डी " पंजाब के लोकगीत शैली में कंपोज्ड एक बेहतरीन गाना है जिसे गाने के लिए " नूरां बहनो " से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता था। ज्योति और सुल्ताना नूरां पंजाबी सूफी गायन में उभरता नाम है , पिछले साल COKE MTV STUDIO में परफॉर्म करने के बाद से  इन्हे राष्ट्रीय ख्याति मिली और अब रहमान के लिए गाकर इन्होने अपने लिए संभावनाओ के नए द्वार खोल लिए।पंजाबी लोक गीत की  बीट्स और उसके साथ नूरां सिस्टर्स की ज़ोरदार आवाज़ मिलकर इस गाने को एक अलग एहसास देते है।  गाने में बांसुरी का भी बेहद खूबसूरत उपयोग लिया गया है जो रहमान के रेगुलर फ्लूटिस्ट नवीन कुमार ने बजायी है। मेरे हिसाब से इस गाने का असली पंच गाने के आखिरी में रहमान के द्वारा निकाली  आवाज़ है जो इस फॉल्क सांग को मॉडर्न और अरबनाइट टच  देती है।

सुहा साहा - ये एक लोरी है जिसे आलिया भट्ट और ज़ेब बंगाश ने गाया है।  गाने के बोल शायद पंजाबी में है।  सुहा साहा का मतलब होता है " लाल खरगोश" । ज़ेब और हानिया पाकिस्तान की मशहूर गायिकाओ की जोड़ी है , ज़ेब मूलतः पश्तून है और उनकी आवाज़ में उम्र और वज़न दोनों है , उम्र इसलिए है क्योकि वो 8 साल की उम्र से गा  रही है और अब एक मंझी फनकार बन गयी है।   ज़ेब और हानिया २००९ और २०१० में COKE STUDIO में परफॉर्म कर चुकी है।  मगर इस गाने में ज़ेब से ज्यादा प्रॉमिनेंट आलिया भट्ट है , जिन्होंने पहली बार गायकी में हाथ आज़माया है।  ये रहमान का है विज़न है जिसने ये  जान लिया कि इस लोरी में यथार्थ और प्रभाव लेन के लिए आलिया भट्ट ही सही है।  ये लोरी रहमान के पुराने गानो की याद दिलाती है।  केबा जर्मिआह की गिटार  STRUMMING कमाल की  है।

हीरा - ये इस एल्बम का मेरा सबसे पसंदीदा गाना है , गाने के लफ्ज़ जानने के बाद से और ज़यादा अच्छा लगने लगा।  ये असल में  "कबीर की  साखिया " से लिए गए ३ दोहे है। रहमान रूहानी और सूफियाना अल्फ़ाज़ों को जिस नाज़ुकता से और जिस नफ़ाज़त से कंपोज़ करते है वो कोई और नहीं कर सकता।  पंद्रहवी शताब्दी में लिखे  दोहे को इक्कीसवी सदी  के एक ऑस्कर विजेता कंपोजर ने  संगीतबद्ध किया  है  और एक ऐसा गाना बना है जो बरसो सुना जाएगा। श्वेता पंडित तेलगु फिल्मो की गायिका है और रहमान के लिए पिछले ५-६ सालो से गा रही है।  गाने में वायलिन जिस तरह से बजा है वो जगजीत सिंह की ग़ज़लों की याद दिलाता है।  ये दोहे अगर जगजीत सिंह से गवाए गए होते तो ये कम्पोजीशन अमर हो जाती।

पटाखा गुड्डी( मेल वर्शन )- पटाखा गुड्डी मेल वर्शन रहमान ने खुद गया है।  फीमेल वर्शन जहाँ  लोक संगीत बेस्ड है , मेल वर्शन में क़व्वाली का टच है।  रहमान की ट्रेडमार्क " प्रोग्रेसिव कोर्डिंग " का एक बेहतरीन मुज़ाहिरा है ये गाना।  बेस गिटार और पावरफुल बीट्स इस गाने की एनर्जी को कॉम्पलिमेंट करते है।  गाना सुनकर साफ़ लगता है कि पंजाबी अल्फ़ाज़ों के इस गाने को सही तलफ्फुज़ से गाने के लिए रहमान को कितनी मेहनत करना पढ़ी होगी।

तू कुजा मन कुजा -  इरशाद कामिल जालंधर यूनिवर्सिटी से उर्दू पोएट्री में पीएचडी है।  उर्दू के अतिरिक्त इन्हे फ़ारसी और अरबी की भी अच्छी समझ है।  इरशाद ने अमीर खुसरो की फ़ारसी - बृज रचनाओ से प्रेरित होकर " रांझणा " में 'तुम मन शुदी लिखा था " और ' रॉकस्टार ' में  कुरान से " कुन फाया कुन " भी उठाया था।  इस बार फिर उन्होंने फ़ारसी से " तू कुजा मन कुजा " लिया है जो दरअसल खुदा से इबादत में कहा जाता है और जिसका मतलब है  " तुम कहाँ और  मै कहाँ" ।  शुरू के इन चार अल्फ़ाज़ों के अलावा ये गाना ठेठ हिंदी है।  गाना सुनकर लगता है कि ये कोई प्रार्थना है।  सुनिधि चौहान ने अर्से बाद रहमान के लिए गया है।  सुनिधि की गायकी एफर्टलेस है , हाई पिच पे बने इस गाने को एक जैसी ग्रेविटी के साथ गाना सिर्फ सुनिधि चौहान के बस की  ही बात है।

वाना मैश अप ? -  हाईवे के बाकी सारे गाने अगर पूर्व है तो ये गाना पश्चिम है। ये गाना फ़िल्म में आलिआ भट्ट की अप्वर्डली मोबाइल लाइफस्टाइल को पोट्रे करता है।  लेडी काश और क्रिसी सिंगापुर बेस्ड रैपर और कंपोजर है।  इन्होने " रोबोट "  फ़िल्म में  " नैना मिले " और इसके तमिल/तेलुगु वर्शन भी गाये है।  इस किस्म के गानो में एक अलग किस्म का ऐ आर रहमान निकल के सामने आता है , ये गाना रहमान के तकनीकी कौशल का नतीज़ा है। इस गाने की तीसरी गायिका सुवी सुरेश है जो साउथ में MTV के विकल्प SS म्यूजिक की खोज है।

इम्प्लोसिव साइलेंस - इम्प्लोसिव साइलेंस इंस्ट्रुमेंटल ट्रैक है। नाम के ठीक उलट इस गाने में एक अजीब सा शोर है , ये शोर बाहरी दुनिया का नहीं है भीतर का है।  अंदर की बैचैनी और छटपटाहट की आवाज़ है ये ट्रैक।  बीच बीच में कुछ आलाप है जिन्हे जोनिता गांधी ने किया है।

"हाईवे" इम्तिआज़ अली का  एम्बीशियस प्रोजेक्ट है जिसमे संगीत का बड़ा हिस्सा है।  रहमान ने अपना काम बखूबी किया है और फ़िल्म का संगीत रहमान की प्रतिष्ठा के अनुरूप है।  रहमान का म्यूजिक एकदम से क्लिक नहीं करता।  नसरीन मुन्नी कबीर कहती है रहमान का संगीत एक कड़वी दवाई कि तरह है जो खाते वक़्त तकलीफ देता है लेकिन फिर सारी ज़िन्दगी असर करता है।  पिछले साल " जब तक है जान " के साथ " खिलाडी 786 " आयी थी , " जब तक है जान " के गाने आज भी  जहाँ सुनने को मिलते है लोग ठहर जाते है वंही " खिलाडी 786 " के गानो पे लोगो ने शादियों  में खूब डांस किया और फिर भूल गए।  शादी की घोड़ी और लम्बी रेस के घोड़ों में येही अंतर है।













Wednesday, December 18, 2013

आपके कमरे में कोई रहता है

आजकल आरडी बर्मन छाए हुए है मेरे म्यूजिकल इकोसिस्टम  में। वैसे हर अच्छे कंपोजर के लिए मेरे कान खड़े ही रहते है लेकिन बीच-बीच में कभी -कभी आरडी का दौरा पढता है , सुबह शाम आरडी आरडी , और हर दौरे में कुछ नया डिस्कवर करता हूँ आरडी के बारे में।     आरडी  अपने टाइम से आगे के कंपोजर थे , स्मार्ट और प्रोग्रेसिव म्यूजिक बनाते थे। आज आरडी का एरा बीते 20 साल से भी ज्यादा होने आए लेकिन उनके बनाये गानो से हर रेडियो स्टेशन और देश के कई नामचीन RJs अपनी दुकान चला रहे है।  मेरे ख्याल से जितनी ज्यादा रीमिक्सेस आरडी के गानों कि बनी है उतनी किसी कि नहीं।   रात १० बजे के बाद आप कोई भी FM लगा लीजिये , हर स्टेशन पे " क़तरा -क़तरा मिलती है " " रोज़ रोज़ आँखों तले " " तुम आगये हो नूर आगया है " या आरडी का ही कोई गाना बजता मिलेगा। आरडी बर्मन के समकालिक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल , कल्याण जी आनन्द जी , खैय्याम, इलियाराजा , बप्पी लहरी  जैसे  असाधारण प्रतिभा के धनी  दिग्गज़  थे बाउजूद इसके आरडी ने अपने लिए एक निश् कार्व कर ली थी।  आरडी बर्मन ने  ही  हिंदी फिल्मो में  टेक्नोलॉजी बेस्ड म्यूजिक का  सूत्रपात  किया था ,  आरडी कि कम्पोज़िशंस तकनीकी  दृष्टि से उच्चकोटि कि होती थी , आप आरडी का कोई गाना एक अच्छे 5.1 ऑडियो सिस्टम में सुनिये आपको लगेगा कि ये आज के हाईटेक स्टूडियो में रिकॉर्ड किया गया है जबकि आरडी के गाने उस वक़्त रिकॉर्ड हुए थे जब ना तो  200  ट्रैक कंसोल होते थे , नहीं लेयर्ड रिकॉर्डिंग , ना डिजिटल रिकॉर्डिंग और ना आई-पेड रिकॉर्डिंग। आरडी अपने समय में उपलब्ध सबसे अच्छी टेक्नोलॉजी का उपयोग करते थे , इसी वजह से उनकी प्रयोगधर्मिता ज्यादा प्रभावकारी रूप में सामने आती थी।

ऐसे ही गिटार का जितना ज्यादा और जितना खूबसूरत इस्तेमाल आरडी ने किया उतना हिंदी के किसी कंपोजर ने नहीं किया। भारत में हिप्पी कल्चर को जिन जिन फैक्टर्स ने फॉस्टर किया उसमे आरडी कि गिटार बेस्ड कम्पोज़िशंस का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।  " दम मारो दम " में  आजभी उतना ही  दम है  जितना तब था। मुझे याद है , मुझे कीबोर्ड सिंथेसाइज़र सीखने वाले मेरे सर  श्री विनोद गोलछा के यहाँ जितने भी  लोग गिटार सीखने आते थे सबकी एक प्रबल इच्छा होती थी कि सबसे पहले ' यादों कि बारात ' का " चुरा लिया है तुमने " सीखें क्योकि इस गाने के शुरू में गिटार का जो पीस है वो कातिल है और बजाने में बड़ा आसान भी है ।   आरडी के गानो में गिटार कि कॉर्ड्स एकदम इनटेन्स होती है  और स्पष्ट सुनाई देती है , गिटार की समझ रखने वाले आसानी से फिगर आउट कर लेते है कि कॉर्ड मेजर है , माइनर है, सेगमेंटेड है, बार्र्ड है  या सेवंथ है। इसीलिए गिटार सीखने वालों को आरडी के गाने या फिर  आज का सूफी रॉक ( कैलाश खेर वाला जॉनर ) बड़ा मुफीद लगता है।

आरडी बर्मन का ज़िक्र गुलज़ार के बिना अधूरा है , और गुलज़ार का ज़िक्र भी आरडी बर्मन के बिना कभी मुकम्मल नहीं होगा ।  दोनों ने मिलके हिंदी फ़िल्म म्यूजिक को जितना  समृद्ध किया और जो ऊंचाइया दी वो सब जानते है।  'आंधी ' 'घर ' 'घरोंदा ' ' परिचय ' ' मासूम ' 'खूबसूरत ' 'किनारा ' ऐसी अनेक फिल्मे है जो इन दोनों कि जुगलबंदी ने अमर कर दी है।  गुलज़ार जैसे बेलगाम और 'बेमीटर' लिरिसिस्ट को अगर किसीने  सबसे बेहतरीन ढंग से सुरों में बांधा है तो वो आरडी बर्मन ही थे।  और अब ये काम ए आर रहमान और विशाल भारद्वाज कर रहे है।  गुलज़ार कुछ भी लिख देते थे और आरडी बर्मन उस कुछ भी कि धुन बना देते थे।  इनके बारे में एक किस्सा फेमस है , एक बार गुलज़ार कुछ लिख के लाये और आरडी को उसकी धुन बनाने को कहा , आरडी ने पढ़ा और झुंझलाकर कहा  कि ये क्या  लिख के लाए हो  ?  कल से तुम टाइम्स ऑफ़ इंडिया का एडिटोरियल उठा के लेआओगे और कहोगे कंपोज़ करो !!  वो गाना था फ़िल्म 'इजाज़त ' का " मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पढ़ा है "।  

एक और बात जो आरडी बर्मन के संगीत को खास और अलग बनाती  थी वो थी उनकी खुद की गायकी , आरडी बर्मन अपने नाम " पंचम " कि मानिद पंचम सप्तक के गायक थे,  ऊँचे सुर में गाते थे।  आवाज़ में थोड़ी कर्कशता थी मगर बेसुरे नहीं  थे कभी।  " समंदर में नहा के और भी नमकीन हो गयी हो " " तुम क्या जानो मोहोब्बत क्या है " " मेहबूबा मेहबूबा " " दिल लेना खेल है दिलदार का " इन गानो में आरडी का म्यूजिक तो था ही लेकिन इन गानो का यूएसपी आरडी बर्मन की  आवाज़ थी।  आरडी बर्मन के जाने से जो वैक्यूम पैदा हो सकता था उसकी भरपाई ए आर रहमान ने कर दी।  मेरे हिसाब से रहमान आरडी 2.0 है।  वही सारे गुण।  टेक्नोलॉजी का बेमिसाल इस्तेमाल , प्रयोगधर्मिता , रेंज  और वैसी ही हटकर आवाज़।  फिल्म्फ़ेयर ने जब " आरडी बर्मन अवार्ड फॉर बेस्ट इमर्जिंग म्यूजिशियन " शुरू किया तो पहला अवार्ड एआर रहमान को ही मिला था।  





Monday, December 16, 2013

ARR is back



ARR is back ...Can bet my last penny for the Music is gonna be  a blockbuster ..Imtiaz Ali best knows how to make ARR produce the freshest tracks .. Rockstar still rocks....See this teaser trailer and  if u are a staunch ARR fan , u will start havin goosebumps...Rahmanishq  ..Rahmania ...whatever u call it.