"रौनक " - कपिल सिब्बल की कविताओ का संकलन , जिसे ए आर रहमान ने संगीतबद्ध किया है। "किस्मत से" इसका पहला ट्रैक है।
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Friday, February 28, 2014
Wednesday, February 26, 2014
RUMI-1
Let the beauty we love be what we do.
There are hundreds of ways to kneel and kiss the ground
रूमी की लिखी ये दो पंक्तियाँ कितनी गेहरी है। वैसे तो रूमी का पूरा साहित्य ही अलौकिक और रहस्यमय् है। मगर इन दो पंक्तियों में जो दर्शन है वो टाइम टेस्टेड है। हमारे आसपास मौजूद हर शह खूबसूरत है , हर काम अच्छा है। लेकिन जो भी किया जाए , उसे शिद्दत से किया जाए। और वही काम किया जाए जिसका जूनून हो। गोयाकि जब हम वही करेंगे जिसका हमें जूनून है तो फिर हम उसमे खुद को निसार कर देंगे , झोंक देंगे और ये ठीक वैसे ही रहेगा जैसे खुदा की इबादत करना। सजदा करना।
जिस बात को आज बड़े बड़े मेंटर्स और मैनेजमेंट थिंकर्स बोलते है वह बात रूमी आज से लगभग 800 साल पहले बोल गए। चेतन भगत के " फाइव पॉइंट समवन " और राजकुमार हीरानी की " थ्री इडियट्स " में भी यही मेसेज था।
बहरहाल , आज ये कविता आज इसलिए याद आ गयी क्योकि कुछ दिनों में " रौनक़ " नाम से कपिल सिब्बल ( वकील एवं राजनेता ) की लिखी कविताओ का एक म्यूजिकल एल्बम रिलीज़ होने वाला है , उसके प्रोमो के शुरू में रूमी की ये दो पंक्तियाँ दिखायी जा रही है। कपिल सिब्बल साहब ने तो जो भी काम किया है आला दर्ज़े का ही किया है। वकील भी उच्च दर्ज़े के और राजनीतिज्ञ भी प्रथम पंक्ति के। निस्न्देह वो कवी भी बेहतरीन ही होंगे। इस एल्बम को कंपोज़ ऐ आर रहमान ने किया है.
Tuesday, February 18, 2014
Wednesday, February 12, 2014
गुलज़ारी कीड़ा
पिछले वैलेंटाइन पे
तुमने गुलाबों के
जो फूल मुझको दिए थे
मै उन्हें सींचती रही , इस आस से
कि वो महकते रहेंगे
खिलते रहेंगे
हर दिन ताज़े गुलाबो से
पर फकत चार दिनों में जब
लगे मुरझाने गुलाब
और हफ्ते भर में
सुख गए और बिखरने लगे
छूने भर से
तो मैंने उन्हें कुछ यूं सहेजा
उन्हें हाथों से मसल कर
मिलाकर यादों की चाशनी
मैंने उनका गुलकंद बना लिया
तुमने गुलाबों के
जो फूल मुझको दिए थे
मै उन्हें सींचती रही , इस आस से
कि वो महकते रहेंगे
खिलते रहेंगे
हर दिन ताज़े गुलाबो से
पर फकत चार दिनों में जब
लगे मुरझाने गुलाब
और हफ्ते भर में
सुख गए और बिखरने लगे
छूने भर से
तो मैंने उन्हें कुछ यूं सहेजा
उन्हें हाथों से मसल कर
मिलाकर यादों की चाशनी
मैंने उनका गुलकंद बना लिया
Friday, December 6, 2013
जगजीत सिंह ज़िंदा है
मिली हवाओ में उड़ने की वो सज़ा यारों
के मै ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों
मै बे-ख्याल मुसाफिर वो रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों
मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी ना लिख सका यारों
तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मै उसके घर का पता किस से पूछता यारों। ..................... वसीम बरेलवी का कलाम है।
जगजीत सिंह ज़िंदा है। किसी कि C ड्राइव में किसीकी E ड्राइव में किसी की पेन ड्राइव में और बहोत सारी लॉन्ग ड्राइव्स में ।
के मै ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों
मै बे-ख्याल मुसाफिर वो रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों
मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी ना लिख सका यारों
तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मै उसके घर का पता किस से पूछता यारों। ..................... वसीम बरेलवी का कलाम है।
जगजीत सिंह ज़िंदा है। किसी कि C ड्राइव में किसीकी E ड्राइव में किसी की पेन ड्राइव में और बहोत सारी लॉन्ग ड्राइव्स में ।
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