Sunday, August 10, 2014

God


A University professor at a well known institution of higher learning challenged his students with this question. "Did God create everything that exists?" 

A student bravely replied, "Yes he did!" 

"God created everything?" The professor asked. 

"Yes sir, he certainly did," the student replied. 

The professor answered, "If God created everything; then God created evil. And, since evil exists, and according to the principle that our works define who we are, then we can assume God is evil." 

The student became quiet and did not answer the professor's hypothetical definition. The professor, quite pleased with himself, boasted to the students that he had proven once more that the Christian faith was a myth. 

Another student raised his hand and said, "May I ask you a question, professor?" 

"Of course", replied the professor. 

The student stood up and asked, "Professor, does cold exist?" 

"What kind of question is this? Of course it exists. Have you never been cold?" 

The other students snickered at the young man's question. 

The young man replied, "In fact sir, cold does not exist. According to the laws of physics, what we consider cold is in reality the absence of heat. Every body or object is susceptible to study when it has or transmits energy, and heat is what makes a body or matter have or transmit energy. Absolute zero (-460 F) is the total absence of heat; and all matter becomes inert and incapable of reaction at that temperature. Cold does not exist. We have created this word to describe how we feel if we have no heat." 

The student continued, "Professor, does darkness exist?" 

The professor responded, "Of course it does." 

The student replied, "Once again you are wrong sir, darkness does not exist either. Darkness is in reality the absence of light. Light we can study, but not darkness. In fact, we can use Newton's prism to break white light into many colors and study the various wavelengths of each color. 

You cannot measure darkness. A simple ray of light can break into a world of darkness and illuminate it. How can you know how dark a certain space is? You measure the amount of light present. Isn't this correct? Darkness is a term used by man to describe what happens when there is no light present." 

Finally the young man asked the professor, "Sir, does evil exist?" 

Now uncertain, the professor responded, "Of course, as I have already said. We see it everyday. It is in the daily examples of man's Inhumanity to man. It is in the multitude of crime and violence everywhere in the world. These manifestations are nothing else but evil. 

To this the student replied, "Evil does not exist, sir, or at least it does not exist unto itself. Evil is simply the absence of God. It is just like darkness and cold, a word that man has created to describe the absence of God. God did not create evil. Evil is the result of what happens when man does not have God's love present in his heart. It's like the cold that comes when there is no heat, or the darkness that comes when there is no light." 

The professor sat down. 

The young man's name - Albert Einstein

Wednesday, August 6, 2014

इंग्लिश -विंग्लिश

अक्सर लोग  पूछते है की मै इंग्लिश में क्यों नहीं लिखता , और सुझाव भी देते है कि अगर मै इंग्लिश में लिखूं तो मेरा ब्लॉग ज़्यादा पढ़ा जाएगा।  बेशक सभी सही बोलते है , इंग्लिश " लिंग्वा फ्रैंका " है।  पिछले कुछ आठ दस  सालो पर गौर कीजिये , इंग्लिश और इंग्लिशपन हमारे अंदर तेज़ी से घुसा है।  "अंग्रेज़ियत " LPG ( लिब्र्लाइजेशन , प्राइविटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन ) का बाई प्रोडक्ट है , जिस से बचा नहीं जा सकता था।  जिन लोगो को अंग्रेजी का  ज्ञान भी नहीं होता वो भी अँगरेज़ होते है।  टैक्सी वाले ( जिन्हे अब कैब और कैबी कहा जाता है ) ,  सब्ज़ी की दुकान वाले , पान वाले भैय्या , खेती किसानी करने वाले, ट्रैन के अटेंडेंट्स , हवाई जहाज के  सफाई कर्मी , होटल के वेटर्स  या  कूली, आप चाहे जिसका नाम ले , सब  पर्याप्त  रूप से अंग्रेजी का  इस्तेमाल करते है।  ये अंग्रेजी समझते भी है और मोबाइल , ATM , इंटरनेट पे काम चलाऊ अंग्रेजी लिख भी लेते है।  मतलब ये की अब अंग्रेजी सिर्फ कान्वेंट एजुकेटेड या ब्लू कालर वाले पढ़े लिखे और संभ्रांत लोगो की लोगो की बपोती नहीं रही , अंग्रेजी का एक्स्पोज़र  रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इतना ज्यादा हो  गया है कि एक औसत से भी कम बुद्धि का इंसान अगर अपने आँख और कान खोल कर जिए तो सिर्फ दो साल में बेहतरीन कामचलाऊ अंग्रेजी सीख  सकता है।  सैकड़ों शब्द  तो सिर्फ टीवी ने जोड़े दिए है हमारी 'लेक्सिकन ' में।  जैसे जैसे टेक्नोलॉजी ज़िन्दगी के  अंदर पैंठ बना रही है वैसे वैसे अंग्रेजी भी जड़े जमा रही है।  ऐसे समय में अंग्रेजी को समझने लायक  ज्ञान होना कोई बड़ी बात नहीं रही।  लेकिन सिर्फ व्यवहारिक अंग्रेजी भर आने से कोई डिप्लोमेट या ब्यूरोक्रेट नहीं  बन सकता। उसके लिए अन्ग्रेज़ी का मर्मज्ञ होना आवश्यक है , शब्दों के  और भाषा के गूढ़ अर्थ की समझ होना आवश्यक है।  अंग्रेजी वो भाषा है जो दुनिया के सभी  गैर -अंग्रेजी भाषियों  लोगो को आपस में जोड़ती है , ये भाषा पूरी दुनिया को एक कलेक्टिव प्लेटफार्म पे लाती है। ऐसे   में अंग्रेजी की गहरी  समझ नहीं होना एक कमी है। स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट की  भाषा में कहे तो " IAS वो प्रोग्राम्स  और एप्स है जो देश को चलाते है"। कूटनीतिक फैसले लेना , अंतराष्ट्रीय मंचो पर देश की और से 'सामूहिक सौदेबाज़ी' करना , सामरिक निर्णय लेने जैसे अनेक महत्वपूर्ण  कामोँ के लिए उच्च स्तरीय अंग्रेजी का ज्ञान होना  ज़रूरी है।  इसलिए ऐसे महत्वपूर्ण ओहदों पर नौकरी दिलाने वाली प्रक्रिया  में अंग्रेजी की तगड़ी परीक्षा ज़रूरी होना चाहिए।  मेरा ब्लॉग बिना अंग्रेजी के भी  चल सकता है , लेकिन ये देश अब बिना अंग्रेजी के नहीं चल सकता।  नेपाल में हिंदी में काम चल सकता है लेकिन अमेरिका में तो अंग्रेजी बोलना भी पढ़ेगी और धड़धड़ाती अंग्रेजी समझना भी पढ़ेगी।  ऐसे में अंग्रेजी के मर्मज्ञ अधिकारियों और नौकरशाहों की ज़रूरत होती है, काम चलाऊ अंग्रेजी जानने वालो की नहीं।  

Friday, July 4, 2014

Who is Maria Sharapova ?


विम्बलडन मैच के बाद मारिया शारापोवा से पूछा गया कि क्या उन्हें पता है कि उनका मैच देखने क्रिकेट के एक महान खिलाडी  आये थे , तो बहनजी का जवाब था " नहीं " उनसे पूछा गया कि क्या वो सचिन तेंदुलकर को जानती है तो उनका कहना था " नहीं " . 

कलेजे में आग लग गयी ये बात जानकार।  मारिया शारापोवा की जितनी उम्र नहीं है उससे ज्यादा समय से सचिन क्रिकेट खेल रहे है।  और अगर भारत में  सचिन के सारे दीवाने एक साथ मिलकर जोर से " आई लव यू सचिन " बोल दे तो मारिया शारापोवा के देश रूस तक आवाज़  पहोच जाए।  क्रिकेट के भगवान , भारत रत्न सचिन तेंदुलकर को नहीं  जानने से सचिन का रुतबा कम नहीं होता।  नुकसान मारिया शारापोवा का ही है , वो जितनी ब्रांड्स एंडोर्स करती है उनकी तो भारत में लुटिया डूबी समझो।  सचिन के प्रशंसकों ने कमर कस ली है।  ये मारिया शारापोवा की एक भयंकर  गलती है। इतनी बड़ी स्पोर्ट्सवुमन होकर दुनिया के इतने बड़े स्पोर्ट्स आइकॉन को नहीं जानती।  उस सचिन को जिसका  सम्मान डेविड बेकहम , माइकल शूमाकर जैसे महानतम खिलाड़ी भी करते है।  पांचवी पास जितना सामान्य ज्ञान नहीं है ?? अगर मै वाल्दीमीर पुतिन होता तो मारिया शारापोवा को रूस से देशनिकाला दे दिया होता। दुनिया में 6 अरब से ज्यादा लोग है , जिनमे से 80 फीसदी से ज्यादा सचिन  को नहीं जानते होंगे , जानना ज़रूरी भी नहीं , लेकिन मारिया शारापोवा जैसी खिलाड़ी का अपनी ही फ्रेटर्निटी के इतने बड़े शख्स को नहीं जानना हज़म नहीं होता।  

सचिन के फेसबुक पेज को २ करोड़ से ज्यादा लोग लाइक करते है वंही मारिया शारापोवा के पेज को 1. 3 करोड़ ( उसमे से आधे लोग इसलिए करते होंगे क्योकि बहनजी दिखती अच्छी है )  . मारिया शारापोवा को इस 'गुनाह -ए -अज़ीम' के लिए भारत के लोग कभी माफ़ नहीं करेंगे।  


Tuesday, July 1, 2014

sbi INTOUCH : Selfie Banking

परिवर्तन शाश्वत है बाकी सब  परिवर्तनशील है।  अगर ज़िंदा रहना है तो खुद को बदलते रहना होगा।  ये बात जितनी इंसानो के लिए  सही है उतनी ही कंपनियों और संस्थाओं  के लिए भी।  जो खुद को बदलते ज़माने के हिसाब से नहीं बदल पाए वो इतिहास हो गए।   भारत की सबसे बड़ी और निस्संदेह सबसे भरोसेमंद बैंक " स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया "  ने समय रहते "परिवर्तनशील" रहने का ये सबक सीख लिया लगता है। विगत कुछ समय से SBI ने टेक्नोलॉजी का जिस तरह इस्तेमाल करना शुरू  किया है उससे तो यही लग रहा है। इंटरनेट बैंकिंग , मोबाइल बैंकिंग , एंड्रॉयड एप्स , इ-कार्नर , केश डिपाजिट मशीन्स , सेल्फ सर्विस कीओस्क ये कुछ ऐसे इनीशिएटिव्स है जो तकनीकी को आधार बनाकर लिए गए है।  इसी तारतम्य में आज यानी 1 जुलाई को अपने स्थापना दिवस पर SBI ने एक ऐसा इनिशिएटिव लिया है जो 207 बरस पुरानी इस बैंक को आगामी 200 बरसों तक भारत में बैंकिंग का सिरमौर बनाए रख सकता है। आज से SBI ने डिजिटल बैंकिंग ब्रांच के एक नए युग का सूत्रपात  किया है। SBI ने मुंबई , बंगलुरु , चिन्नई , दिल्ली और अहमदाबाद में अपनी 6 डिजिटल ब्रांचेज शुरू की है , डिजिटल ब्रांचेज की इस श्रंखला का नाम रखा गया है " sbi INTOUCH".   

 जिस देश की आधी आबादी 25 बरस के नीचे की उम्र की हो और जहाँ  हर नौजवान 'टच' स्क्रीन का स्मार्ट मोबाइल फ़ोन रखता हो वंहा युवा ग्राहकों से सतत 'टच' में रहने हेतु टेक्नोलॉजी ही इकलौता विकल्प है।  SBI  के डिप्टी MD श्री S K मिश्रा कहते है " InTouch" SBI  की डिजिटल यात्रा का शुभारम्भ है"।ये प्रयास है  जेन  "Y" को Brand SBI के टच में रखने का।  

" sbi INTOUCH" पर इंस्टेंट अकाउंट ओपनिंग , इंस्टेंट  पर्सनलाइज्ड डेबिट कार्ड , लोन्स के 'इन-प्रिंसिपल' अप्रूवल जैसी अनेको सुविधाए उपलब्ध रहेगी।  कुल जमा , ये बैंकिंग का वो मज़ा है जिसका अनुभव पहले कभी नहीं किया गया।  " sbi INTOUCH" में तकनीकी सहयोगी " एक्सेंचर " है जो एक नामी IT कंपनी है।  आज माननीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने दिल्ली में पहली  " sbi INTOUCH""  शाखा का उद्घाटन किया।  श्री जेटली ने इसके तुरंत बाद ट्वीट कर बताया की " sbi INTOUCH" तकनीक के सहारे उठाया गया एक सशक्त कदम है जो आज के महत्वकांशी युवाओ को केंद्र में रख के उठाया गया है। 

" sbi INTOUCH"   के बारे में ज्यादा जानने के लिए आप इस लिंक को एक्सप्लोर कर सकते है   http://www.sbi.co.in/intouch/








Tuesday, June 10, 2014

'नक्सलवादी आँखे

अभी हाल ही में कुछ काम से छत्तीसगढ़ गया   था ।   पहले भी अनेको बार जाता  रहा हूँ लेकिन इस बार की अनुभूति कुछ अलग रही। जिस दिन जगदलपुर पंहुचा उस दिन आई-ट्यून्स से एक फिल्म के गाने डाउनलोड किये  एक गाने के बोल कुछ यूं थे - छप्पन छुरी छत्तीसगढ़ी  अखियाँ तेरी नक्सलवादी। बड़ा अजीब लगा ये बोल सुनकर।  'नक्सलवादी आँखे' निस्संदेह एक नया जुमला है लेकिन इस किस्म के जुमले  एग्रीगेटेड फैक्ट्स को सच्चाई मानकर चलने वाले अनेक लोगो के पूर्वाग्रह को और पुख्ता कर देते है।  जगदलपुर का  नाम सुनकर एक आम इंसान के दिमाग में बड़ी भयवाह सी तस्वीर बनती है।  घने जंगल , आदिवासी लोग सी. आर. पी. एफ. की गश्ती टुकड़ियां और बारूदी सुरंगे।  लाज़मी सी बात है क्योकि  अखबारों और अन्य मीडिया में  यही सब दिखाया जाता है  इसीलिए  हर दफे जब छत्तीसगढ़ जाता हूँ तो सब हिदायत देते है कि ज़रा सम्हाल के जाना।  इस बार मैंने भी आँखों की कुछ जोड़ियों को देखा , जो नक्सलवादी नहीं आशावादी थी।  इसके अलावा कुछ और फोटोग्राफ्स भी खीच के लाया ताकि यहाँ आके बता सकूँ की जगदलपुर अफ़ग़ानिस्तान नहीं है और न वंहा कदम कदम पे मुह पे कपडा बांधे   तालिबानी लड़ाके  घूमते है।