जिहाल-ए -मिस्कीन मकुन बरंजिश , बेहाल-ए -हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन , तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
( मुझे रंजिश से भरी इन निगाहों से ना देखो क्योकि मेरा बेचारा दिल जुदाई के मारे यूँही बेहाल है। जिस दिल कि धड़कन तुम सुन रहे हो वो तुम्हारा या मेरा ही दिल है )
ये गाना उन दिनों का है जब मै तीसरी या चौथी class में था। मिथुन चक्रबोर्ती और अनीता राज़ बस की छत पे और बैकग्राउंड में ये गाना , और गाने के बीच में मिथुन दादा का " कोई शक़ " बोलना। कुछ ऐसी कशिश थी 'गुलामी ' के इस गाने में कि दिल और दिमाग में उतर गया। बाद में जब समझ और शौक आया तो जाना कि ये गाना 'गुलज़ार' ने लिखा था, LP ( लक्ष्मीकांत -प्यारेलाल ) ने compose किया था और लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार ने गाया था। लेकिन गाने कि पहली लाइन क्या है ये कभी समझ नहीं आया। इसके बाद की lyrics हिंदी में थी सो समझ आ जाती थी। कई साल तक इस गाने को मै " जिहाले मस्ती मुकुंद रंजिश" सुनता रहा और गाता भी रहा। मज़े कि बात थी कि गुजिश्ता सालो में कभी कोई ऐसा नहीं मिला जिसे ये गाना सही गाते पाया हो।आज बहोत दिनों बाद ये गाना फिर से सुना , बीबी से पूछा " ये गाना सुना है ? तो तपाक से बोली , हाँ , गुलामी का गाना है मिथुन बस के ऊपर बैठ के गाता है। मैंने पूछा पहली लाइन क्या है तो बोली " जिहाले मस्ती मुकुंद " करके कुछ है , पूरी समझ नहीं आती लेकिन गाना बढ़िया है। कुछ ऐसी सीरत है इस गाने में कि इतनी क्लिष्ट पहली लाइन के बावजूद आज भी ये गाना इतना अच्छा लगता है। गुलामी 1985 में आयी थी।बहरहाल बात lyrics की , गूगल की कृपा से मैंने एक साल पहले इस गाने की पहली लाइन समझी और ये जाना कि गुलज़ार ने ये गाना अमीर खुसरो कि एक बेहतरीन सूफियाना कविता से प्रेरित होकर बनाया था जिसकी पहली लाइन कुछ इस तरह है -
जिहाल-ए -मिस्कीन मकुन तग़ाफ़ुल ,दौड़ाए नैना बनाये बतियां
के ताब-ए-हिजरां न दरम ए जाना , न लेहो काहे लगाये छतियां
(मतलब , आँखे दौड़ाके और बाते बनाकर मेरी बेबसी को नज़रअंदाज़ ( तग़ाफ़ुल ) मत करो। मेरे सब्र कि अब इन्तेहाँ हो गयी है , मुझे सीने से क्यों नहीं लगाते ) पहली लाइन पर्शियन में है और दूसरी बृज भाषा में। गुलज़ार ने इसके पहले 'ग़ालिब' से प्रेरित होकर एक गाना लिखा था " दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन" जो मौसम फ़िल्म में था।इरशाद कामिल का " रांझणा " फ़िल्म में लिखा " तू मन शुदी " भी अमीर ख़ुसरो की poem से inspired है।
" मन तू शुदम तू मन शुदी ,मन तू शुदम तू जान शुदी
ताकस ना गोयद बाद अजीन , मन दीगरम तू दिगरी "
( मै तू हो गया हूँ और तू मै हो गयी है , मै जिस्म हूँ तू जान है , इसके बाद कोई नहीं कह पायेगा कि तू और मै जुदा है। )
इरशाद कामिल का " कुन फाया कुन " भी क़ुरान कि आयत से प्रेरित है जिसका मतलब है " आपने ( अल्लाह ने ) कहा हो , और सब हो गया " . "जिहाले मस्ती " की मस्ती यु ही बनी रहेगी , LP का म्यूजिक ही कुछ ऐसा था। जिन्हे लिरिक्स पता है उनके लिए इस गाने का अलग ही मज़ा है जिन्हे नहीं पता उन्हें कोई फर्क नहीं पढ़ना। .. " कोई शक "